!!!---: संगठन-सूक्त :---!!!
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सं समिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ ।
इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर ।।१।।
हे प्रभो ! तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ।
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिए धन वृष्टि को ।।
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मानांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे सं जनाना उपासते ।।२।।
प्रेम से मिलकर चलो बोलो सभी ज्ञानी बनो ।
पूर्वजों की भांति तुम कर्तव्य के मानी बनो ।।
समानो मन्त्रः समिति समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।३।।
हो विचार समान सबके चित्त मन सब एक हो।
ज्ञान देता हूं बराबर भोग्य पा सब नेक हो ।।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमास्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।४।।
हो सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा ।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढे सुख सम्पदा।।४।।
शान्ति-पाठ
ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधयः शान्ति: । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ।।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में
जल में थल में और गगन में,
अंन्तरिक्ष में अग्नि पवन में
औषधि वनस्पति वन उपवन में ,
सकल विश्व में जड़- चेतन में ।
शांति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में , -----
ब्राह्मण के उपदेश वचन में ,
क्षत्रिय के द्वारा हो रण में ,
वैश्य जनों के होवे धन में ,
और शुद्र के हो चरणन में ,
शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में -----
शान्ति हो राष्ट्र निर्माण सृजन में ,
नगर ग्राम में और भवन में ,
जीव मात्र के तन में, मन में ,
और जगत के हो कण - कण में ,
शान्ति कीजिए प्रभु त्रिभुवन में-----